Laldas ke Anmol Vachan 1- यदि आप अपनी प्रशंसा करेंगे और दूसरों की निंदा, तो आपके प्रति लोगों की श्रद्धा घट जाएगी। 2- आप जिस विषय पर अधिक चिंतन-मनन किया करेंगे, आपको उसी विषय का विशेष ज्ञान होगा, अन्य विषयों का नहीं। 3- मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए संसार में जीवित रहना चाहता है। 4- जो जलाशय में तैरना नहीं जानता है, यदि वह जलाशय में डूब रहे व्यक्ति को बचाने के लिए जाएगा, तो डूब रहा व्यक्ति उसे ही दबोच लेगा, फलतः दोनों डूब मरेंगे। 5- यदि इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं, तो सकाम भक्त को इष्ट पर बड़ा क्रोध होता है, वह इष्ट को गाली भी देने लग जाता है। 6- यदि स्त्री नासमझ हुई, तो वह अपने पति का जीवन नरक बना देती है। 7- नासमझ स्त्री में आसक्त व्यक्ति को मदारी के बंदर की तरह नाचना पड़ता है। 8- जो आपकी गोपनीय बातों को जानता है, वह आपको नाना नाच नाचने के लिए विवश कर सकता है। 9- संसार भ्रमात्मक है। 10-Ðी का स्वभाव पुरुष के स्वभाव से भिन्न होता है। 11-जिस व्यक्ति में कोई विशेषता नहीं होती, वही प्रायः ईर्ष्यालु और कटुवादी होता है। 12-यदि धरती पर प्राणी जन्म-ही-जन्म लेते रहें, कभी मरें नहीं, तो धरती का संतुलन बिगड़ जाएगा और प्राणियों का जीवन भी संकट में पड़ जाएगा। 13-अपरिवर्त्तनशील परमात्मा सृष्टि इसलिए करते हैं कि उनमें सृष्टि करने की या निर्गुण से सगुण होने की प्रवृत्ति, स्वभाव, गुण या संभावना है; जैसे वाष्प में जल तथा बर्फ बनने का गुण है, पत्थर में जल बनने का गुण नहीं है। 14-श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया था, वह पद्यबद्ध नहीं था, गद्य में था। वेदव्यासजी ने उनके उपदेशों को पद्यबद्ध कर दिया है। 15-‘महाभारत’ पद्यबद्ध है; परन्तु इसके सभी पात्र पद्यबद्ध संस्कृत भाषा में नहीं बोलते थे। व्यावहारिक जीवन में लोग गद्य में ही बातचीत किया करते हैं। गद्यात्मक भाषा का पद्यात्मक भाषा में रूपान्तरण वेदव्यासजी के द्वारा हुआ है। 16-यदि आप अपने हाथ से किसी को कोई उपहार देंगे, तो वह बड़ा प्रसन्न होगा; परन्तु दूसरे के हाथ से उपहार दिलाएँगे, तो वह अधिक प्रसन्न नहीं होगा। 17-अच्छा ज्ञान हमें पापी दे या पुण्यात्मा, ग्रहण कर लेना चाहिए। हमें ज्ञान से मतलब है, पापी या पुण्यात्मा से नहीं। 18-चिन्ता मत कीजिए, सबके जीवन में उन्नति-अवनति होती है। संसार का कोई भी व्यक्ति सदैव एक-जैसी स्थिति में नहीं रह पाता। 19-आपके साथियों में से किसी एक को कोई अपने पास बुलाये, तो आपको चाहिए कि आप उसके साथ-साथ न जाएँ। 20-किसी की बात का खंडन करने पर ही आपके प्रति उसका विरोध हो जाएगा, उसकी बात का समर्थन करने पर नहीं। 21-यदि असभ्य के प्रति हम भी असभ्य का-सा व्यवहार कर बैठें, तो हम भी लोगों की दृष्टि में असभ्य ठहर जाएँगे। 22-यह इच्छा मत रखिए कि सब जगह आपको ही सबसे अधिक आदर मिले। किसी की भी ऐसी इच्छा सब जगह पूरी नहीं हो सकती। 23-जिससे आपको प्रेम नहीं है, उसके द्वारा दी गयी कोई भी वस्तु आप लेना पसंद नहीं करेंगे। 24-संसार में सदैव सावधान-सतर्क रहिए, चौकन्ने रहिए, अपनी दृष्टि को सब ओर रखिए और अपने चिन्तन-मनन को जाग्रत् रखिए। 25-चोरी-डकैती के द्वारा जीवन-निर्वाह करने की अपेक्षा भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करना अच्छा है। 26-अभाव में जी लेना अच्छा है; परन्तु दूसरे के आगे हाथ पसारना अच्छा नहीं। 27-किसी के प्रति उलटा व्यवहार करके उसे अप्रसन्न करना ठीक नहीं। 28-बड़े के द्वारा सम्मानित होने पर व्यक्ति का बड़प्पन बढ़ जाता है। 29-जब व्यक्ति उन्नति कर रहा होता है, तब अनिवार्यतः उसके जीवन में विपत्तियाँ आती हैं। #श्रीछोटेलाल दास
Laldas ke Anmol Vachan
1- यदि आप अपनी प्रशंसा करेंगे और दूसरों की निंदा, तो आपके प्रति लोगों की श्रद्धा घट जाएगी।
2- आप जिस विषय पर अधिक चिंतन-मनन किया करेंगे, आपको उसी विषय का विशेष ज्ञान होगा, अन्य विषयों का नहीं।
3- मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए संसार में जीवित रहना चाहता है।
4- जो जलाशय में तैरना नहीं जानता है, यदि वह जलाशय में डूब रहे व्यक्ति को बचाने के लिए जाएगा, तो डूब रहा व्यक्ति उसे ही दबोच लेगा, फलतः दोनों डूब मरेंगे।
5- यदि इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं, तो सकाम भक्त को इष्ट पर बड़ा क्रोध होता है, वह इष्ट को गाली भी देने लग जाता है।
6- यदि स्त्री नासमझ हुई, तो वह अपने पति का जीवन नरक बना देती है।
7- नासमझ स्त्री में आसक्त व्यक्ति को मदारी के बंदर की तरह नाचना पड़ता है।
8- जो आपकी गोपनीय बातों को जानता है, वह आपको नाना नाच नाचने के लिए विवश कर सकता है।
9- संसार भ्रमात्मक है।
10-. स्त्री का स्वभाव पुरुष के स्वभाव से भिन्न होता है।
11-जिस व्यक्ति में कोई विशेषता नहीं होती, वही प्रायः ईर्ष्यालु और कटुवादी होता है।
12-यदि धरती पर प्राणी जन्म-ही-जन्म लेते रहें, कभी मरें नहीं, तो धरती का संतुलन बिगड़ जाएगा और प्राणियों का जीवन भी संकट में पड़ जाएगा।
13-अपरिवर्त्तनशील परमात्मा सृष्टि इसलिए करते हैं कि उनमें सृष्टि करने की या निर्गुण से सगुण होने की प्रवृत्ति, स्वभाव, गुण या संभावना है; जैसे वाष्प में जल तथा बर्फ बनने का गुण है, पत्थर में जल बनने का गुण नहीं है।
14-श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश कुरुक्षेत्र के मैदान में दिया था, वह पद्यबद्ध नहीं था, गद्य में था। वेदव्यासजी ने उनके उपदेशों को पद्यबद्ध कर दिया है।
15-‘महाभारत’ पद्यबद्ध है; परन्तु इसके सभी पात्र पद्यबद्ध संस्कृत भाषा में नहीं बोलते थे। व्यावहारिक जीवन में लोग गद्य में ही बातचीत किया करते हैं। गद्यात्मक भाषा का पद्यात्मक भाषा में रूपान्तरण वेदव्यासजी के द्वारा हुआ है।
16-यदि आप अपने हाथ से किसी को कोई उपहार देंगे, तो वह बड़ा प्रसन्न होगा; परन्तु दूसरे के हाथ से उपहार दिलाएँगे, तो वह अधिक प्रसन्न नहीं होगा।
17-अच्छा ज्ञान हमें पापी दे या पुण्यात्मा, ग्रहण कर लेना चाहिए। हमें ज्ञान से मतलब है, पापी या पुण्यात्मा से नहीं।
18-चिन्ता मत कीजिए, सबके जीवन में उन्नति-अवनति होती है। संसार का कोई भी व्यक्ति सदैव एक-जैसी स्थिति में नहीं रह पाता।
19-आपके साथियों में से किसी एक को कोई अपने पास बुलाये, तो आपको चाहिए कि आप उसके साथ-साथ न जाएँ।
20-किसी की बात का खंडन करने पर ही आपके प्रति उसका विरोध हो जाएगा, उसकी बात का समर्थन करने पर नहीं।
21-यदि असभ्य के प्रति हम भी असभ्य का-सा व्यवहार कर बैठें, तो हम भी लोगों की दृष्टि में असभ्य ठहर जाएँगे।
22-यह इच्छा मत रखिए कि सब जगह आपको ही सबसे अधिक आदर मिले। किसी की भी ऐसी इच्छा सब जगह पूरी नहीं हो सकती।
23-जिससे आपको प्रेम नहीं है, उसके द्वारा दी गयी कोई भी वस्तु आप लेना पसंद नहीं करेंगे।
24-संसार में सदैव सावधान-सतर्क रहिए, चौकन्ने रहिए, अपनी दृष्टि को सब ओर रखिए और अपने चिन्तन-मनन को जाग्रत् रखिए।
25-चोरी-डकैती के द्वारा जीवन-निर्वाह करने की अपेक्षा भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करना अच्छा है।
26-अभाव में जी लेना अच्छा है; परन्तु दूसरे के आगे हाथ पसारना अच्छा नहीं।
27-किसी के प्रति उलटा व्यवहार करके उसे अप्रसन्न करना ठीक नहीं।
28-बड़े के द्वारा सम्मानित होने पर व्यक्ति का बड़प्पन बढ़ जाता है।
29-जब व्यक्ति उन्नति कर रहा होता है, तब अनिवार्यतः उसके जीवन में विपत्तियाँ आती हैं। #श्रीछोटेलाल दास

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